Monday, June 16, 2014

मेरी प्रथम पच्चीसी : सातवीं किस्त


(स्वांतसुखाय लिखा जा रहा मेरी ज़िंदगी का ये संस्मरण अब तक आधे रास्ते में भी नहीं पहुंच पाया है..क्योंकि अपने गुजश्ता दौर की जुगाली कर उसे सम्यक् तौर पे पेश करने के लिये एक खास तरह के मूड़ की दरकार होती है जो हमेशा नहीं रह पाता..यही वजह है कि तकरीबन एक साल से मेरी प्रथम पच्चीसी के प्रारंभिक 13-14 वर्षों को ही बयां कर पाया हूँ..बहरहाल, ज़िंदगी के अब कुछ खुशनुमा पलों से बाकिफ़ कराना है तो चलिये चलते है अतीत के उस दौर में-जिस वर्ष नेटवेस्ट ट्राफी जीत युवराज और कैफ हीरो बने थे, जब अक्षरधाम और संसद पे हुए आतंकी हमले ने देश को दहलाया था, जिस वर्ष डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम की राष्ट्रपति पद के लिये ताजपोशी हुई थी..जी हाँ सन्-2002)

अपना घर-आंगन छोड़ एक बार फिर अपनी पुस्तैनी गलियों से दूर जा रहा था..दिल में तनिक भी ख्वाहिश नहीं थी उस अंगने को युं छोड़ आगे बढ़ जाने की..पर दुनिया के निर्मम यथार्थ और किसी अनजाने तथाकथित भविष्य को संवारने मां-बाप के जतन भी जारी थे और वो मुझे उस गाँव की मिट्टी से दूर गुलाबीनगरी की धरा पर पटक आना चाहते थे। ताकि मुझमें भी संस्कारों का संचार हो सके, मैं भी कोई ख्यातलब्ध हस्ती बन सकुं, जहाँ मेरे हुनर को तराशा जाये और इस काबिल बनाये जा सके कि इस फानी दुनिया में खुद के बल पे अपने अस्तित्व को टिकाये रख सकूँ। पर उस नादान बचपन की कहाँ इतनी आरजू होती है कि बड़े होकर अफसरी का लिबास मिले, लाखों-करोड़ों की संपत्ति जुटाई जाये, देश-दुनिया में अपनी शोहरत कमाई जाये। तब तो बस क्रिकेट का कोई दस-ग्यारह रुपये का मैच रखकर उसे जीत लेते थे तो लगता था कि हमसे बड़ा शहंशाह कोई नहीं है, कभी स्कूल के चार दोस्त अपने बड़बोलेपन की तारीफें कर देते तो लगता दुनिया की सारी शोहरत अपने ही कदमों में हैं..घर आयी कोई मौसी या बुआ 10-5 रुपये नेग के बतौर दे जाती तो लगता अपना लाखों का बैंक बेलेंस हो गया है पर ये नादानी थी..हम वो नहीं समझते जो हमारे बड़े समझते हैं। लेकिन एक बात है कि नादानी की ये खुशियां हमें कभी समझदारी से हासिल नहीं हो सकती..क्योंकि नादानी स्वप्न दिखाती है और समझदारी यथार्थ से रुबरू कराती है और सपनों का सौंदर्य यथार्थ से कई गुना खूबसूरत होता है।

खैर, रोते-गाते और जोर-जबरदस्ती के सहारे मेरी मम्मी और मामा ने मुझे अपने उस गांव से दूर कर ही दिया..2002 की 4 अगस्त को मैंने पहली मर्तबा जयपुर की जमीं पर कदम रखा। पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट। जी हाँ यही वो आसरा था जहाँ अगले पाँच सालों के लिये मेरा डेरा जमने जा रहा था..दरअसल जिस्मानी तौर पर तो मेरा इस संस्थान से साथ सिर्फ 5 सालों के लिये जुड़ा पर रुहानी स्तर पे मेरा पूरा जीवन ही इस संस्थान का गुलाम हो गया। मेरे इस वाक्य से इतना तो समझ आ ही गया हो गया कि इस संस्थान की मेरे जीवन में क्या अहमियत रही है..भले ही पहले बहुत न-नुकर की यहाँ आने के लिये पर एक बार यहाँ जमा तो फिर हमेशा के ही लिये इसका हो गया। कहने को तो ये एक जैन संस्था है..पर यहाँ से मुझे मानवता और सांस्कृतिक मूल्यों के ऐसे पाठ सीखने मिले जिसने ज़िंदगी की बाकी राह खुद ब खुद आसान कर दी। मेरे इस वाक्य से ये न समझना कि यहाँ पढ़ लेने के बाद मेरी ज़िंदगी में विपदायें आना बंद हो गई..विपत्तिेयें तो भरसक आयी और आज भी आती हैं पर अब कोई विपत्ति मुझे चित नहीं कर पाती..हां मैं विचलित ज़रूर होता हूँ और गिरता भी हूँ पर इस संस्थान से मिली शिक्षा मुझे फिर खड़े होकर तेज चलने की प्रेरणा दे देती है।

बहरहाल, मैं जयपुर आ चुका था...और लगभग चार दिन बीत जाने के बाद भी मेरा तनिक भी मन यहाँ रुकने का नहीं था..मेरे इस रवैये से मम्मी और मामा को खासे मानसिक त्रास से गुजरना पड़ रहा था। कई लोगों के समझाने के बाद भी दिल अब भी उन्हीं गांव के खेल मैदानों और अपने घर के सामने वाले बरामदे में लगा हुआ था..पर कहना चाहिये कि मेरी होनहार अच्छी थी जो लाख न चाहते हुए भी मेरी मानसिक स्थिति वहाँ रहने के अनुकूल बनी..और इसके लिये मैं दो व्यक्तियों के योगदान को ज़रूर स्मरण करना चाहूंगा-एक मेरे क्लासमेट अमितजी को और दूसरे हमारे संस्थान के तत्कालीन अधीक्षक धर्मेंद्र शास्त्री को..जिनकी हिदायतों ने तब न जाने मुझपे क्या असर किया कि बंदा उन दीवारों में खुद को बांधने के लिये तैयार हो सका।

मैं जयपुर में रुक चुका था..शुरु-शुरु में सब अजीब था। दोस्त कोई था नहीं और जो साथी थे वो मेेरे देहाती लहजे को लेके मजाक भी उड़ाया करते थे और पता लग रहा था कि यार भले अपन अपने गांव के बल्लम खां हैं पर इस भीड़ में अपनी शख्सियत गंगुतेली से गई बीती है। उस संस्थान में कई प्रतियोगिताएं और स्पर्धाएं  होती जिनमें भाग लेने को बहुत जी चाहता पर कभी हिम्मत नहीं जुटा पाता और कभी हिम्मत जुटा के उनमें हिस्सा लिया भी तो अपने आत्मविश्वास की कमतरी का बहुत जुर्माना भरना पड़ा..जी हाँ जिल्लत झेलनी पड़ी जिससे मरे-कुचे आत्मविश्वास की और बारह बज गई। अपना कोई अस्तित्व ही नहीं था उन शुरुआती दिनों में..इसलिये अपनी हस्ती को बनाये रखने के लिये कुछ हुनरमंद और गुंडा टायप दोस्तों की मंडली में दरबारी कवि होने का काम करने लगे..दरबारी कवि बोले तो उनकी चमचागिरि करने लगे। ताकि किसी न किसी तरह पहचान बनी रहे।

जिस-तिस प्रकार उन हालातों से सामंजस्य बिठा रहे थे..और जमके मस्तियों के संंग गलबाहियां कर रहे थे। जयपुर के सारे हॉटस्पॉट चंद महीनों में ही घूम लिये उसका कारण ये था कि मन में ये सोच बन गई थी कि बस एक साल पढकर यहाँ से कलटी मार लेना है..ऐशो-आराम की कोई सुविधा नहीं थी, अनुशासित जीवन शैली, समय की सख़्त पाबंदियां और विलासिता रहित दिनचर्या। इन हालातों में भला नादान दिल कहाँ चैन पा सकता है और इसलिये मैं भाग जाना चाहता था। हालत ये थी कि कभी टीवी पे क्रिकेट मैच आ रहा हो तो बाजार की किसी दुकान पे या किसी होटल में रखी टीवी पे जमीन पर बैठ के उस क्रिकेट मैच का लुत्फ़ लिया क्योंकि टीवी, मोबाइल, इंटरनेट जैसे साधन उस माहौल में और तब के वक्त में हमें नहीं हासिल थे। बहुत सारी चीज़ों में आत्मनिर्भरता भी आ रही थी। अपने बैंक संबंधी, स्कूल-कॉलेज संबंधी सभी काम खुद सेे करना, खुद कपड़े धोना, अकेले सफ़र करना ऐसी कई चीज़ें उस नन्ही उम्र में सीख रहे थे जिससे खुद में जिम्मेदारी का अहसास भी हो रहा था। अबसे पहले तक इन सब कामों को करने के लिये मम्मी-पापा पे आश्रित थे। लेकिन ये आत्मनिर्भरता अंदर ही अंदर एक स्वतंत्र व्यक्तित्व को ग़ढ़ रही थी। ये तब तो हमें बढ़ा कष्टकर जान पड़ता पर आज जब उसे देखते हैं तो मां-बाप और किस्मत को शुक्रिया अदा करने को जी चाहता है।

हमें नया आकार देते हुए समय का पहिया अपनी गति से चल रहा था..और हम उस माहौल को एडजस्ट भी करने लगे थे और उस एडजस्ट करने में कहीँ संस्थान के नियमों से रिश्ता जोड़ लिया था तो कुछ नियमों को तोड़ दिया था। मुझे अच्छे से याद है जब हमने 2003 का वर्ल्ड कप देखने के लिये उस संस्थान में गैरकानूनी ढंग से एक छोटा टीवी खरीदकर रखा था क्योंकि दक्षिण अफ्रीका में हुए उस वर्ल्डकप के अधिकांश मैच देर रात तक चलने वाले थे और तब हॉस्टल के बाहर जाकर कहीं टीवी देख पाना तो संभव नहीं था न। नियमों की सख्ती के बीच कोई अपने मन का काम कर लेने का मजा ही कुछ और है..पर हाँ ये ज़रूर है कि मैंने वहाँ रहते हुए भले कितने ही नियम तोड़े पर कभी खुद को अनैतिक नहीं होने दिया..मेरी स्वच्छंदता ने कभी उद्दंडता का रूप  अख्तियार नहीं किया.. इसका कारण मेरे परिवार और माँ-बाप के संस्कार ही हैं जिनकी बदौलत नियमों को भी नियमों के दायरे में रहते हुए तोड़ा। ज़िंदगी बढ़ रही थी और मेरे अंदर एक नयी शख्सियत अपना रूप गढ़ रही थी...घटनाएं तो कई हैं जिन्होंने मुझे आकार दिया पर सबका ज़िक्र न संभव है और न ही रोचक। इसलिये ठहरते हैं पर अगली किस्त में कुछ नयी घटनाओं और नये जज़्बातों के साथ फिर हाज़िर होता हूँ..........................

ज़ारी.........

4 comments:

  1. बढ़िया रही यह किस्‍त भी।

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  2. arey yaar, jaldi khatam ho gayi yeh to... agli kist ke liye aur kitna wait karna padega??

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  3. बहुत सुन्दर और रोचक प्रस्तुति...

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  4. इन जज्‍बातों का भ्‍ाी अजब समंदर होता है
    बूंद-बूंद बरसता है
    इसका खारापन भी मीठा लगता है

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