Tuesday, July 30, 2013

मेरी प्रथम पच्चीसी

जिंदगी के फलसफें पे हम ज्यों के त्यों खड़े रहते हैं और लगातार हम पे से वक्त गुज़रता रहता है..ये गुजरता हुआ वक्त खुद तो प्रकृति के अनुरूप गतिमान बना रहता है पर अपनी इस गतिशीलता से हमारी प्रकृति में बदलाव लाता रहता है...इस बदलाव से लगता है कि शायद हम गुज़र रहे हैं और वक्त जस का तस है। जिंदगी के एक हिस्से तक हम भागते रहते हैं फिर मौत भागती है हमारे पास आने को..और हम अपनी जिजीविषा के चलते उस मृत्यु के सत्य पे से आँखे मूंद अपने सपनों को पंख देने में लगे रहते हैं, जिंदगी की अंतिम श्वांस तक। इस गुजरते हुए वक्त ने मुझे पच्चीस साल का कर दिया है..और अब थोड़ा ठहरकर एक मंथन की दरकार है कि क्या खोया क्या पाया...बच्चन जी के शब्दों में कहूं तो क्या भूलुं-क्या याद करूं..और साथ ही ज़रूरत है अपने आगामी जीवन की दिशा की समीक्षा करने की। अपने इस पच्चीसवे पड़ाव पर अपने अतीत की यात्रा पे निकल रहा हूँ..कई उतार-चढ़ाव रहे और उन उतार चढ़ावों ने जहाँ एक ओर मजबूती दी है तो कई जगह मेरे व्यक्तित्व की असल परतें भी उतार फेंकी हैं..और चढ़ गई है कुछ झूठी मुस्कान, औपचारिक बातों, सतही संवेदनाओं और लाग-लपेट पूर्ण असंख्य रिश्तों की नकली व दिखावटी परतें। मेरे अतीत की ये झांकी वास्तव में मेरे अपने लिये ही एक प्रेरणा और आत्ममंथन के हेतु से प्रस्तुत कर रहा हूँ लेकिन मेरे जीवन के कुछ हिस्से शायद किसी और के लिये भी प्रेरणादायी साबित हो सकते हैं ऐसी मैं आशा करता हूँ..हालांकि मैं कोई सेलिब्रिटी नहीं जिसके जीवन संस्मरणों को कोई खास तवज्जो दी जाये..और आप इसे देखें-पढ़ें, ऐसा मेरा कोई आग्रह भी नहीं है...इसलिये अपनी स्वयं की रिस्क पे ही मेरी इस प्रथम पच्चीसी में प्रवेश करे...ये पूर्णरूपेण मेरे और मेरे लिये लिखी गई है..वैसे भी यादों की सिर्फ स्वयं को ही संतृप्त कर पाती है....खैर पच्चीसी का आगाज़ करते हैं....

अथ कथारम्भः-

31 जुलाई 1988। मध्यप्रदेश के रायसेन जिले स्थित एक बमुश्किल 7-8 हजार की जनसंख्या वाले गांव में जन्म हुआ..पूरे विश्व में हर मिनट 258 बच्चे पैदा होते हैं इनमें से तकरीबन 70 बच्चे प्रतिमिनट के हिसाब से अकेले हिन्दुस्तान में पैदा होते हैं। इस हिसाब से एक लाख से भी ज्यादा बच्चे प्रतिदिन इस देश की सरजमीं पे अवतरित हो जाते हैं..इसे आंकड़े को बताने का मेरा उद्देश्य महज इतना है कि इस देश में पैदा हो जाना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। लेकिन सबसे ज्यादा जन्म के उत्सव और रीति-रिवाजों से संयुक्त कार्यक्रम हमारे देश में ही मनाये जाते हैं...मैं आज तक नहीं समझ पाया कि किसी बच्चे के पैदा होने को सहजता से क्यों नहीं लिया जाता...बेफिजूल में इतना लोग बौराते क्यों हैं..और खास तौर पे हिन्दुस्तान जैसे देश में इन अतिरेक पूर्ण उत्सवों का तो कोई मूल्य ही नहीं है क्योंकि हम जिस तरह से अपना कल निर्मित कर रहे हैं उस परिवेश में बच्चों का स्वस्थ और उज्जवल भविष्य कहीं नज़र ही नहीं आता। खैर, ये सब मैं इसलिये बता रहा हूँ कि ऐसे ही अतिरेक पूर्ण उत्सव और आयोजन मेरे जन्म पे भी किये गये थे ऐसा मुझे बताया गया है।

और जैसा कि हिन्दुस्तानियों की स्वाभाविक प्रवृ्त्ति है कि किसी चीज़ को उसके असल रूप में न स्वीकार कर, अनायास ही किसी दैवीय अवतार या विशिष्ट शक्ति संपन्नता के लबादे उड़ा दिये जाते हैं वैसे ही लबादे मेरे जन्म के वक्त परिवार जनों ने मुझे उड़ा दिये..और कोई कहता कि मेरे जन्म के वक्त कृष्ण जी सपने में आये थे तो कोई कहता कि किसी बाबा ने फलां-फलां पूजा-पाठ करने को कहा और वो पाठ शुरु करते ही मैं इस धरती पे आ धमका। अरे, भाई चीजों को सहजता में ग्रहण करो न...क्या बिना किसी दैवीय ताकत के पैदा हुए एक आम बच्चे की अपनी कोई अहमियत नहीं है जो इस तरह के नाना विशेषण और उपाधियां उसपे थोपी जा रही हैं। लेकिन धर्म और परंपराओं में आकंठ डूबे इस देश और देशवासियों ने तर्कसम्मतता को कबकी तिलांजिलि देदी है।

हजारों-लाखों बच्चे इस देश में पैदा होते हैं पर उनमें से चंद खुशनसीब बच्चे होते है जिनकी सर्वोपयोगी सुविधाओं और अच्छे माहौल में परवरिश होती है...कमसकम मैं उन खुशनसीबों में से था। यद्यपि विलासितापूर्ण बचपन नहीं था मेरा, न ही मनोरंजन हेतु लग्ज़रीस् की उपलब्धि थी पर ज़रूरत की समस्त चीजें और सबसे ज्यादा आवश्यक तत्व प्रेम, मुझे भरपूर मात्रा में प्राप्त हुआ। धुंधली पड़ चुकी यादों में जितना कुछ भी देख पा रहा हूँ तो मुझे यही दिखता है कि कभी किसी वस्तु के लिये लंबी ज़िद नहीं करना पड़ी और माँ-बाप से समस्त वाञ्छित वस्तुएं सहज प्राप्त होती गई। विश्व के संपूर्ण बच्चों की तरह मेरे लिये भी माँ की गोद सबसे आरामदायक जगह और पापा की छाया सबसे बड़ा सुरक्षाकवच थी। यदि बचपन में ज्ञान और विवेक होता तो यकीन मानिये कभी बड़े होने की ख्वाहिश न होती..और न ही जो दार्शनिक व्यक्ति जिस मुक्ति की बात करते हैं उसकी ही कोई आरजू होती..क्योंकि बचपन सी निश्चिंतता ही मुक्ति में होती होगी जिसके लिये विश्व का संभ्रांत मनुष्य प्रयत्नशील सा दिखता है।

एक धार्मिक और पारंपरिक मान्यताओं को मानने वाला, व्यवसायी, सामान्य परिवार मुझे प्राप्त हुआ था...और वर्तमान के प्रेक्टिकल होते अपने आसपास के परिवेश में भी, मैं खुद को अपनी ज़मीन से जुड़ा हुआ और तथाकथित मॉडर्निटी से बचा हुआ पाता हूँ उसका कारण मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि ही है। पहले पाँच वर्ष कैसे बीते मुझे कुछ खास स्मरण नहीं बस इतना याद है कि मेरे बर्थडे के दिन तरह-तरह के जतन किये जाते थे...और महीने भर पहले से योजना तैयार की जाती थी..मुझमें भी बर्थडे को लेके खासा एक्साइटमेंट रहा करता था..और हम तीनों भाईयों में मेरे बर्थडे के दिन ही हम तीनों का कंबाइन बर्थडे सेलीब्रेट किया जाता था, उन दोनों छोटे भाईयों को भी इस तरह की पट्टी पड़ा दी गई थी कि मेरा बर्थडे ही खास है तुम भी इसके साथ ही सेलीब्रेट करके खुश रहो और वो दोनों सीधे-सादे बच्चे भी..मुझे कुछ स्पेशल मानके चुप ही रहा करते थे। आज ये सोच के अच्छा नहीं लगता..कि भले ही माँ-बाप भीतरी तौर पर अपने बच्चों की परवरिश में कोई भेद न करते हों पर ऊपरी तौर पे परवरिश में भेद हो ही जाता है...और इस भेद को लेके बच्चों में अनायास विद्वेष पैदा हो जाता है...बहरहाल मेरे भाईयों के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ और मैं खुशनसीब हूँ कि आज उनमें इस लेवल की अंडरस्टेंडिंग है जो इस चीज़ को ज्यादा मैटर नहीं करते लेकिन ये बात सच है कि हम तीनों की परवरिश में भले ही कोई भेदभाव नहीं हुआ, पर उसकी अभिव्यक्ति में भेदभाव ज़रूर हुआ है और मैं इस भेदभाव में लाभ की स्थिति में रहा हूँ।

पाँच वर्ष तक की कोई और चीज़ जो मुझे याद आती है वो है नानी का घर। नानी के घर जाने को लेके भी बहुत उत्सुकता रहती थी और मेरे स्कूल जाने से पहले नानी की कहानियाँ ही मेरी पहली शिक्षा थी। नानी की ये शिक्षा मुझे आगे लंबे समय तक मिलती रही और आज अपने भीतर जो एक संवेदनशील मनुष्य को पाता हूँ उसका कारण मेरी नानी की वही संगति है हालांकि धीरे-धीरे वो संवेदनशीलता सिस्टम और हालातों के हाथों कुंद पड़ती जा रही है..पर विषमताओं में भी अपने मूल्यों और संस्कारों से आज भटकाव नहीं हो पाता उसका कारण दादी-नानी की वही शिक्षा है। अफसोस होता है कि आज के सिकुड़ते परिवारों में दादी-नानी के ये प्रारंभिक स्कूल ख़त्म होते जा रहे हैं और बच्चों को कार्टून नेटवर्क और इंटरनेट जैसे वर्चुअल वर्ल्ड से प्रारंभिक शिक्षा मिलती है...

खैर, अभी रुकता हूँ..अपने स्कूल दिनों के साथ और बचपन की कुछ और सौंदी-सौंदी यादों के साथ वापस आउंगा...

ज़ारी.....

13 comments:

  1. शुभकामनायें प्रियवर-
    यशस्वी भव-

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    1. धन्यवाद रविकरजी....

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  2. आपके बारे में जानकार रुचि और जगी, अच्छा भी लगा। २५ वर्ष होने की शुभकामनायें।

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    1. धन्यवाद प्रवीण जी...

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  3. क्योंकि बचपन सी निश्चिंतता ही मुक्ति में होती होगी जिसके लिये विश्व का संभ्रांत मनुष्य प्रयत्नशील सा दिखता है।...........
    हालांकि धीरे-धीरे वो संवेदनशीलता सिस्टम और हालातों के हाथों कुंद पड़ती जा रही है..पर विषमताओं में भी अपने मूल्यों और संस्कारों से आज भटकाव नहीं हो पाता उसका कारण दादी-नानी की वही शिक्षा है। अफसोस होता है कि आज के सिकुड़ते परिवारों में दादी-नानी के ये प्रारंभिक स्कूल ख़त्म होते जा रहे हैं और बच्चों को कार्टून नेटवर्क और इंटरनेट जैसे वर्चुअल वर्ल्ड से प्रारंभिक शिक्षा मिलती है........कड़वा सच उकेरा है। बहुत बढ़िया संस्‍मरण।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद विकेश जी...

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  4. २५ वसंत पार हो गए ... उनकी यादें कितनी ज्यादा हैं ... सबके मन में होती हैं ... बहुत अच्छा लगा आपको करीब से जानना ...

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    1. धन्यवाद दिगंबह जी...यादों का कारवां अभी आगे भी बढ़ना है...

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  5. आपको पचीसवी वर्षगांठ की शुभकामनाएँ, आपके संस्मरण पढ़ ऐसा लगा कि अपने बचपन से गुजर रहा हूँ. तब डायरी का दौर था। जब 21 साल का हुआ तो एक दिन मैंने भी ऐसा ही लिखा था अपनी डायरी में, मैं 21 साल का हो चुका हूँ और मुझे बच्चन जी की वो पंक्तियाँ याद आ रही हैं क्या भूलूँ, क्या याद करूँ।

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    1. शुक्रिया सौरभ जी...गुजरा वक्त याद कर मुस्कुराना और उससे नई प्रेरणा लेना सबको अच्छा लगता है...

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  6. आपके जीवन से बहुत कुछ साकने लायक है...वैसे तो आपके व्यक्तित्व से बहुत कुच परिचित हूँ ...फिर भी अभी बहुत कुछ बाकी है...जल्द लिलिए आगली कड़ी...इतजार में.....साथ ही जन्नदिवस की हार्दिक शुबकामनायें

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    1. thnx dear...तू तो जिगरी है मेरा :)

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  7. विलम्ब से सही पर,आपको पचीसवी वर्षगांठ की हार्दिक शुभकामनाएँ,

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